घर्षण (Friction)
ब्रह्माण्ड में ऐसा कोई भी पिण्ड नहीं है जो पूर्णतः चिकना हो। जब एक पिण्ड दूसरे पिण्ड की सतह पर चलता है तो उनके सम्पर्क तलों के बीच एक बल कार्य करता है जो गतिशील पिण्ड की गति का विरोध करता है। इस गति विरोधी बल को घर्षण कहते हैं। जब एक गेंद को खुरदरे फर्श पर लुढ़का दिया जाता है तो गेंद घर्षण के कारण शीघ्र ही रुक जाती है, किन्तु चिकने फर्श पर लुढ़काने पर घर्षण कम होने के कारण अधिक समय के बाद रुकती है।
इस प्रकार जब एक पिण्ड दूसरे पिण्ड के ऊपर फिसलता है या फिसलने का प्रयास करता है तो उनके सम्पर्क तलों के मध्य एक बल कार्य करता है जो पिण्डों की सापेक्ष गति का विरोध करता है। इस गति विरोधी बल को ही घर्षण या घर्षण बल कहते हैं (चित्र )।

स्थैतिक और गतिक घर्षण (Static and Kinetic Friction)
मानलो चित्र के अनुसार लकड़ी का एक गुटका A एक क्षैतिज तल B पर रखा हुआ है। गुटके के साथ एक कमानीदार तुला C जुड़ा हुआ है, ताकि इसकी सहायता से गुटके पर क्षैतिज बल लगाया जा सके तथा उसे नापा भी जा सके।

जब गुटके पर कोई बल नहीं लगाया जाता है तो घर्षण बल का मान शून्य होता है, किन्तु ज्योंही गुटके पर क्षैतिज बल F लगाया जाता है, उनके सम्पर्क तलों के मध्य घर्षण बल कार्य करने लगता है। यदि क्षैतिज बल का मान कम है तो गुटका विरामावस्था में ही रहता है। इस स्थिति में कार्य करने वाला घर्षण स्थैतिक घर्षण कहलाता है।
इस प्रकार जब एक पिण्ड को दूसरे पिण्ड पर चलाने का प्रयास किया जाता है फिर भी पहला पिण्ड विरामावस्था में ही रहता है तो दोनों पिण्डों के सम्पर्क तलों के मध्य कार्य करने वाले घर्षण को स्थैतिक घर्षण कहते हैं।
ध्यान रहे कि जब बाह्य बल (क्षैतिज बल) लगाने पर भी गुटका विरामावस्था में होता है तो घर्षण बल का मान बाह्य बल के मान के बराबर होता है। अब ज्यों-ज्यों बाह्य बल के मान को बढ़ाया जाता है, घर्षण बल का मान भी बढ़ने लगता है। इस क्रिया में एक स्थिति ऐसी आती है जबकि गुटका ठीक चलने को तैयार हो जाता है। अब यदि गुटका पर सूक्ष्म बल भी लगा दिया जाए तो गुटका चलना प्रारम्भ कर देता है। इस स्थिति को गुटका ठीक चलने को तैयार होता है, सीमान्त सन्तुलन की स्थिति कहते हैं तथा इस समय कार्य करने वाले घर्षण को सीमान्त घर्षण कहते हैं।
इस प्रकार जब एक पिण्ड को दूसरे पिण्ड पर चलाने का प्रयास किया जाता है और पहला पिण्ड ठीक चलने को तैयार होता है तो इस स्थिति को सीमान्त सन्तुलन की स्थिति कहते हैं। सीमान्त सन्तुलन की स्थिति में कार्य करने वाले घर्षण को सीमान्त घर्षण (Limiting friction) कहते हैं। सीमान्त घर्षण का मान अधिकतम होता है।
सीमान्त सन्तुलन की स्थिति में गुटका A पर थोड़ा-सा भी बल लगा दिया जाये तो गुटका चलना प्रारम्भ कर देता है। इस स्थिति में कार्य करने वाला घर्षण गतिक घर्षण कहलाता है। इस प्रकार जब एक पिण्ड दूसरे पिण्ड के ऊपर चलता है तो दोनों पिण्डों के सम्पर्क तलों के मध्य कार्य करने वाले घर्षण को गतिक घर्षण कहते हैं।

गतिक घर्षण का मान सदैव सीमान्त घर्षण के मान से कम होता है। स्पष्ट है कि ज्योंही गुटका चलना प्रारम्भ करता है, घर्षण बल का मान कम हो जाता है। चित्र में लगाये गये बाह्य बल और घर्षण बल के बीच ग्राफ प्रदर्शित किया गया है।
ध्यान रहे कि जब बाह्य बल का मान गतिक घर्षण के बराबर होता है तो गुटका एकसमान चाल से चलता है, किन्तु जब बाह्य बल का मान गतिक घर्षण से अधिक हो जाता है तो गुटके में त्वरण उत्पन्न हो जाता है।
नोट (Important Points):
(i) घर्षण बल, सम्पर्क बल का सम्पर्क तलों के समान्तर घटक होता है, जो दो तलों के मध्य सापेक्ष गति का विरोध करता है।
(ii) स्थैतिक घर्षण समुपस्थित गति (Impending motion) का विरोध करता है।
(iii) समुपस्थित गति उस गति को कहते हैं जो तब होती है जब आरोपित बल के अन्तर्गत घर्षण अनुपस्थित हो। घर्षण के कारण यह गति नहीं होती।
लोटनिक-घर्षण (Rolling Friction)
सर्पी-घर्षण— जब एक पिण्ड दूसरे पिण्ड पर फिसलता है तो उनके सम्पर्क तलों के मध्य कार्य करने वाले घर्षण को सर्पी-घर्षण कहते हैं। इस प्रकार के घर्षण में फिसलने वाले पिण्ड का एक ही तल सदैव दूसरे पिण्ड के सम्पर्क में होता है।
यदि एक पुस्तक को टेबल पर सरकायें तो उनके सम्पर्क तलों के मध्य कार्य करने वाला घर्षण सर्पी-घर्षण होता है।
लोटनिक-घर्षण— जब एक पिण्ड को दूसरे पिण्ड के तल पर घुमाया जाता है या घुमाने का प्रयास किया जाता है तो दोनों के सम्पर्क तलों के मध्य कार्य करने वाला घर्षण लोटनिक-घर्षण कहलाता है। लोटनिक-घर्षण में घूमने वाले पिण्ड के भिन्न-भिन्न भाग क्रमशः दूसरे पिण्ड के तल के सम्पर्क में आते हैं।
जब साइकिल चलाते हैं तो टायर के भिन्न-भिन्न भाग क्रमशः पृथ्वी के सम्पर्क में आते हैं। साइकिल के पहिये और पृथ्वी के बीच कार्यशील घर्षण लोटनिक-घर्षण होता है। प्रयोगों द्वारा पाया गया है कि लोटनिक-घर्षण का मान सर्पी-घर्षण के मान से कम होता है।
सर्पी-घर्षण और लोटनिक-घर्षण में अन्तर
| क्र. | सर्पी-घर्षण | लोटनिक-घर्षण |
|---|---|---|
| 1. | जब एक पिण्ड दूसरे पिण्ड पर फिसलता है तो दोनों के सम्पर्क तलों में कार्य करने वाला घर्षण सर्पी-घर्षण कहलाता है। | जब एक पिण्ड दूसरे पिण्ड पर घूमता है तो दोनों के सम्पर्क तलों में कार्य करने वाले घर्षण को लोटनिक-घर्षण कहते हैं। |
| 2. | फिसलने वाले पिण्ड का वही तल सदैव दूसरे पिण्ड के सम्पर्क में होता है। | घूमने वाले पिण्ड के भिन्न-भिन्न भाग दूसरे पिण्ड के सम्पर्क में क्रमशः आते हैं। |
| 3. | सर्पी-घर्षण का मान अधिक होता है। | लोटनिक-घर्षण का मान कम होता है। |
लोटनिक-घर्षण का कारण (Cause of rolling friction)— जब एक पिण्ड दूसरे पिण्ड पर घूमता है तो उनके सम्पर्क क्षेत्र का मान कम होने के कारण दाब का मान बढ़ जाता है
अतः घूमने वाले पिण्ड के नीचे दूसरे पिण्ड का भाग थोड़ा-सा दब जाता है तथा चित्र 8.8 के अनुसार सामने थोड़ा-सा उभार (Mount) बन जाता है।
इसके अतिरिक्त घूमने वाले पिण्ड के नीचे सम्पर्क क्षेत्र भी थोड़ा-सा संपीड़ित हो जाता है। इस प्रकार घूमने वाले पिण्ड को लगातार गड्ढे से निकालकर उभार को पार करना होता है। दोनों सम्पर्क तलों के बीच लगने वाला आसंजक बल इसका विरोध करता है। यही लोटनिक-घर्षण का कारण है।

यदि घूमने वाले पहिये की त्रिज्या r और अभिलम्ब प्रतिक्रिया R हो तो लोटनिक घर्षण $$f_r$$ निम्न व्यंजक द्वारा प्रदर्शित किया जाता है—
जहाँ $$\mu_r$$ लोटनिक घर्षण-गुणांक है।
घर्षण से लाभ एवं हानियाँ (Advantages and Disadvantages of Friction)
हानियाँ (Disadvantages):
(i) घर्षण के कारण मशीनों के कल पुर्जे घिसते हैं।
(ii) घर्षण के कारण मशीनों की दक्षता कम हो जाती है।
(iii) घर्षण के कारण मशीनों को दी गई ऊर्जा का कुछ भाग ऊष्मा के रूप में व्यय हो जाता है।
लाभ (Advantages):
घर्षण से हानियाँ बहुत ही कम हैं किन्तु लाभ अनेकानेक हैं। यदि घर्षण नहीं होता तो हम पृथ्वी पर चल नहीं पाते। संक्षेप में घर्षण से लाभ निम्नानुसार हैं—
(i) पैरों और जमीन के मध्य घर्षण होने के कारण ही हम पृथ्वी पर चल पाते हैं।
(ii) घर्षण के कारण ही हम भोजन को चबा पाते हैं।
(iii) घर्षण से आग उत्पन्न करते हैं।
(iv) घर्षण के कारण ही रस्सी बना पाते हैं।
(v) घर्षण के कारण ही वाहनों पर ब्रेक लगाकर उन्हें रोक पाते हैं।
(vi) घर्षण के कारण ही दीवार पर कील ठोक पाते हैं।
इस प्रकार हम कह सकते हैं कि हमारे लिए घर्षण उतना ही आवश्यक है जितना कि भोजन।
घर्षण कम करना (Reducing Friction)
घर्षण को निम्न प्रकार से कम किया जा सकता है—
(i) पालिश् करके (By polishing)— सम्पर्क तलों की पालिश् करके घर्षण को कम किया जा सकता है। इस विधि द्वारा सम्पर्क तलों के मध्य अन्तरग्रंथन कम हो जाता है।
(ii) बाल बियरिंग (Ball bearing) का उपयोग करके— इसमें दो समाक्षीय सिलिण्डर होते हैं। दोनों के मध्य कठोर इस्पात के छर्रे लगे होते हैं। वाहन से जुड़ी धूरी (Axle) आन्तरिक सिलिण्डर से दृढ़तापूर्वक फिट रहती है। बाह्य सिलिण्डर पहिये से दृढ़तापूर्वक जुड़ा होता है। जब धूरी दक्षिणावर्त दिशा में (मानलो) घूमती है तो छर्रे वामावर्त दिशा में घूमने लगते हैं। फलस्वरूप पहिया दक्षिणावर्त दिशा में घूमने लगता है। इस प्रकार बाल बियरिंग का उपयोग करने से लोटनिक-घर्षण क्रियाशील होता है जिसका मान बहुत ही कम होता है।

(iii) स्नेहक (Lubricant) का उपयोग करके— दोनों सम्पर्क तलों के मध्य स्नेहक तेल या ग्रीस डाल देने से दोनों तल एक-दूसरे के प्रत्यक्ष सम्पर्क में नहीं आ पाते। वास्तव में स्नेहक तेल या ग्रीस डालने से शुष्क घर्षण तरल घर्षण (Fluid friction) में परिवर्तित हो जाता है जिसका मान अपेक्षाकृत कम होता है। दोनों सम्पर्क तलों के बीच सम्पीड़ित वायु को प्रवाहित करने से वायु एक प्रत्यास्थ गद्दो (Elastic cushion) की भाँति कार्य करती है जिससे घर्षण का मान कम हो जाता है।
(iv) धारारेखीय आकृति देकर (Streamlining)— जब कोई पिण्ड किसी तरल (द्रव या गैस) में गति करता है तो उसके पीछे तरल के कण बहाव की नियमित रेखाओं में, जिसे धारारेखीय बहाव (Streamline flow) कहते हैं, गति करते हैं। पाया गया है कि तरल द्वारा पिण्ड पर डाला गया अवरोध उस न्यूनतम स्थिति में होता है जबकि पिण्ड की आकृति धारारेखीय आकृति के समान होती है। अतः मोटर गाड़ियों की आकृतियाँ धारारेखीय पैटर्न पर बनाई जाती हैं जिससे तरल का अवरोध न्यूनतम हो जाये।
(v) उचित पदार्थों का उपयोग करके— घर्षण पदार्थों की प्रकृति पर निर्भर करता है। कांक्रीट और लोहे के बीच का घर्षण, कांक्रीट और रबर के बीच घर्षण से ज्यादा होने के कारण ही मोटर गाड़ियों के चक्के रबर के बनाये जाते हैं। मशीनों के घूमने वाले भाग पर कम घर्षण गुणांक वाले पदार्थों की लाइनिंग खींच देने से भी घर्षण कम हो जाता है। इस हेतु बैबिट (Babit) नामक मिश्र धातु, जो टिन, ताँबा और एण्टीमनी का मिश्रण होता है, का उपयोग किया गया है।
घर्षण को बढ़ाना (Increasing Friction)
जैसा कि ऊपर बतलाया जा चुका है कि घर्षण के कारण ही हम पृथ्वी पर चल पाते हैं। घर्षण का महत्व उस समय समझ में आता है जब हम चिकने फर्श पर चलने का प्रयास करते हैं और फिसलकर गिर पड़ते हैं। जब मोटर गाड़ी का पहिया कीचड़ में फँस जाता है तो घर्षण कम होने के कारण पहिया अपने स्थान पर ही तेजी से घूमने लगता है, बाहर बिल्कुल नहीं निकल पाता। ऐसी स्थिति में पहिये के नीचे लकड़ी का तख्ता रख देते हैं जिससे घूमने लगता है, बाहर बिल्कुल नहीं निकल पाता। ऐसी स्थिति में पहिये के नीचे लकड़ी का तख्ता रख देते हैं जिससे घर्षण का मान बढ़ जाता है और पहिया आसानी से बाहर निकल जाता है। सामान्यतया घर्षण बढ़ाने के उपाय निम्नानुसार हैं—
(i) चिकनी मिट्टी पर रेत डालते हैं।
(ii) मशीनों में लगे पट्टे में चिपचिपा तरल पदार्थ लगाते हैं।
(iii) मोटर गाड़ियों के टायरों में खाँचे बने होते हैं जिससे घर्षण का मान बढ़ जाता है। इस प्रकार मोटर गाड़ियों को आगे बढ़ने में सहायता मिलती है।
(iv) जूते के तलवे खुरदरे बनाये जाते हैं।
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