एकसमान वृत्तीय गति (Uniform Circular Motion)
परिभाषा— जब कोई वस्तु एकसमान चाल से वृत्ताकार मार्ग पर गति करती है, तो उसकी गति को एकसमान वृत्तीय गति कहते हैं।
उदाहरण—
(i) यदि रस्सी के एक सिरे से पत्थर के टुकड़े को बाँधकर रस्सी के दूसरे सिरे को हाथ से पकड़कर क्षैतिज तल या ऊर्ध्वाधर तल में घुमाया जाये तो पत्थर की गति वृत्तीय गति होगी।
(ii) बिजली के पंखे के ब्लेड की नोंक की गति भी वृत्तीय गति का उदाहरण है।
(iii) पृथ्वी के चारों ओर चन्द्रमा की गति को भी लगभग वृत्तीय गति माना जा सकता है।
वृत्तीय गति में कण के त्वरण का व्यंजक (Expression for Acceleration of a Particle in Circular Motion)
अभिकेन्द्र त्वरण (Centripetal Acceleration)— मानलो कोई कण एकसमान चाल से किसी वृत्तीय मार्ग पर गति कर रहा है। यद्यपि इसकी चाल एकसमान है किन्तु इसके वेग की दिशा लगातार बदलती रहती है। अतः इसका वेग परिवर्तित हो रहा है अर्थात् वृत्तीय गति एक त्वरित गति है। चूँकि वेग का परिमाण नियत रहता है, वेग की दिशा में त्वरण का घटक शून्य होगा। अतः त्वरण सदैव वेग के लम्बवत् कार्य करता है। चूँकि वेग प्रत्येक बिन्दु पर स्पर्श-रेखा की दिशा में कार्य करता है, त्वरण सदैव स्पर्श-रेखा के लम्बवत् दिशा में अर्थात् केन्द्र की ओर कार्य करेगा। चूँकि इसकी दिशा निरन्तर केन्द्र की ओर रहती है, अतः इसे अभिकेन्द्र त्वरण कहते हैं। उसकी दिशा बार-बार बदलती रहती है, यह परिवर्ती त्वरण होता है, किन्तु इसका मान नियत रहता है।
चित्र : वृत्तीय गति एवं ताक्षणिक सदिश निरूपण(a) O केन्द्र व r त्रिज्या के वृत्तीय मार्ग पर गति तथा वेग सदिश v₁ व v₂
(b) वेग में परिवर्तन Δv के लिए सदिश त्रिभुज ABC
मानलो कोई कण O केन्द्र और r त्रिज्या के वृत्तीय मार्ग में कोणीय वेग ω से एकसमान वृत्तीय गति कर रहा है। समय t पर उसकी स्थिति P तथा t + Δt पर Q है [चित्र (a)]।
बिन्दु P पर उसका वेग v₁ तथा Q पर v₂ है। दोनों बिन्दुओं पर वेग स्पर्श-रेखा की दिशा में कार्य करेगा।
मानलो ∠POQ = Δθ
चूँकि कण की चाल (अर्थात् वेग का परिमाण) एकसमान है, बिन्दु P और Q पर वेग सदिशों को समान लम्बाई के सदिशों द्वारा प्रदर्शित किया गया है [चित्र (a)]।
समयान्तराल Δt में वेग में परिवर्तन की गणना के लिए बिन्दु A लो तथा AB = v₁ तथा AC = v₂ बनाओ [चित्र (b)]।
तब, ∠BAC = Δθ
चित्र (b) से स्पष्ट है कि वेग में परिवर्तन Δv = v₂ – v₁ = BC
ΔABC में, कोण = चाप / त्रिज्या से,
Δθ = |Δv| / |v₁|
Δθ = Δv / v (∵ |Δv₁| = v) …(1)
परन्तु कोणीय वेग, ω = Δθ / Δt
या Δθ = ω . Δt …(2)
समी. (1) और (2) से,
Δv / v = ω . Δt
या Δv / Δt = v . ω …(3)
परन्तु, limΔt→0 (Δv / Δt) = dv / dt = a = कण का त्वरण (ताक्षणिक)
अतः समी. (3) से,
त्वरण a = v . ω …(4)
परन्तु, v = ω . r या ω = v / r
समी. (4) में मान रखने पर,
a = v × (v / r)
a = v² / r …(5)
अभिकेन्द्र त्वरण a को कोणीय वेग ω और त्रिज्या r के पदों में व्यक्त किया जा सकता है। हम जानते हैं कि v = ω . r
समी. (5) में मान रखने पर,
a = (ω r)² / r
a = ω² r …(6)
परन्तु, ω = 2πν जहाँ, ν = प्रति सेकंड चक्करों की संख्या अर्थात् परिभ्रमण आवृत्ति
a = (2πν)² r
a = 4π² ν² r …(7)
समी. (4), (5), (6) और (7) अभिकेन्द्र त्वरण के लिए व्यंजक हैं।
अभिकेन्द्र त्वरण की दिशा—
ऊपर हम देख चुके हैं कि त्वरण a = limΔt→0 (Δv / Δt)
सदिश रूप में, a = Δv / Δt
अतः त्वरण a की दिशा Δv के अनुदिश होगी। अब यदि Δt का मान शून्य की ओर अग्रसर होगा तो Δθ भी शून्य की ओर अग्रसर होगा अर्थात् यदि Δt → 0 तो Δθ → 0।
इस सीमा में v₁ और v₂ सम्पाती होंगे। अब ΔABC में,
AB = AC (वेग के परिमाण)
∴ ∠ABC = ∠BCA
∠ABC + ∠BCA + Δθ = π
2 ∠ABC + Δθ = π
2 ∠ABC = π – Δθ
∠ABC = ½ (π – Δθ)
सीमा Δθ → 0 पर, ∠ABC = π / 2
इस प्रकार, सदिश Δv सदिश v₁ और v₂ दोनों के लम्बवत् होता है। चूँकि त्वरण a सदिश Δv के अनुदिश होता है, वह सदिश v₁ और v₂ दोनों के लम्बवत् होगा। वृत्तीय गति में वेग की दिशा स्पर्शरेखीय होती है।
अतः त्वरण a की दिशा वृत्तीय मार्ग में केन्द्र के अनुदिश होगी। इसीलिए इस त्वरण को अभिकेन्द्र त्वरण कहते हैं।
नोट:
- एकसमान वृत्तीय गति करने वाले कण का वेग सदिश लगातार परिवर्तित होता रहता है, किन्तु उसका परिमाण (अर्थात् चाल) स्थिर रहता है। पथ के प्रत्येक बिन्दु पर वेग सदिश स्पर्श-रेखा में होता है।
- एकसमान वृत्तीय गति करने वाले कण का त्वरण सदिश वृत्तीय मार्ग के केन्द्र की ओर होता है। यद्यपि त्वरण सदिश परिवर्तित होता रहता है, उसका परिमाण नियत रहता है।
अभिकेन्द्र त्वरण का व्यंजक
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अभिकेन्द्र त्वरण का व्यंजक
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