परावैद्युत का ध्रुवण (Polarisation of Dielectrics)
परावैद्युत माध्यम सदैव विद्युत् रूप से उदासीन होता है चाहे वह ध्रुवीय हो या अध्रुवीय हो। ध्रुवीय परावैद्युत के अणु इधर-उधर बिखरे रहते हैं। एक अणु का धन सिरा दूसरे अणु के ऋण सिरे के पास होता है। इस प्रकार वे एक-दूसरे के प्रभाव को नष्ट कर देते हैं जिससे परिणामी द्विध्रुव आघूर्ण शून्य होता है ।

जब किसी परावैद्युत को किसी विद्युत् क्षेत्र में रखा जाता है तो उसके अणुओं पर (जो वैद्युत द्विध्रुव की भांति कार्य करते हैं) विद्युत् क्षेत्र के कारण बल आघूर्ण कार्य करने लगता है। यह बल आघूर्ण प्रत्येक अणु को क्षेत्र के समान्तर लाने का प्रयास करता है। विद्युत् क्षेत्र की तीव्रता बढ़ाने पर बल आघूर्ण का मान भी बढ़ने लगता है। फलस्वरूप अधिक-से-अधिक अणु क्षेत्र की दिशा में संरेखित होने लगते हैं।

चित्र में P और Q एक समान्तर प्लेट संधारित्र की दो प्लेटें हैं। उनके मध्य ABCD एक आयताकार परावैद्युत माध्यम है। यदि परावैद्युत ध्रुवीय है तो दोनों प्लेटों के बीच विद्युत् क्षेत्र लगाने पर उसके अणु विद्युत् क्षेत्र के अनुदिश संरेखित होने लगते हैं और यदि परावैद्युत अध्रुवीय है तो अणुओं में द्विध्रुव आघूर्ण प्रेरित हो जाते हैं। इस प्रकार विद्युत् क्षेत्र के कारण परावैद्युत ध्रुवित हो जाता है। फलस्वरूप उसके अणुओं के ऋणावेश धनावेशित प्लेट P की ओर तथा धनावेश ऋणावेशित प्लेट Q की ओर विस्थापित हो जाते हैं। इस प्रकार परावैद्युत के फलक AB पर ऋणावेश की अधिकता तथा फलक CD पर धनावेश की अधिकता होती है, किन्तु मध्य में नेट (कुल) आवेश का मान शून्य होता है, क्योंकि प्रत्येक अणु का धनावेश अगले अणु के ऋणावेश के प्रभाव को निरस्त कर देता है।
यदि P और Q में आवेश होने के कारण विद्युत् क्षेत्र की तीव्रता E₀ तथा परावैद्युत माध्यम में प्रेरित आवेश के कारण विद्युत् क्षेत्र की तीव्रता Eₚ हो, तो E₀ और Eₚ की दिशायें परस्पर विपरीत होंगी ।

अतः संधारित्र की दोनों प्लेटों के मध्य परावैद्युत माध्यम रखने पर प्रभावी विद्युत् क्षेत्र की तीव्रता E = E₀ – Eₚ होगी, इसकी दिशा E₀ के अनुदिश होगी। अतः किसी विद्युत् क्षेत्र में परावैद्युत माध्यम रख देने पर मूल विद्युत् क्षेत्र की तीव्रता सदैव घट जाती है।
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परावैद्युत का ध्रुवण (Polarisation of Dielectrics) — प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1: परावैद्युत का ध्रुवण (Polarisation of Dielectrics) किसे कहते हैं?
उत्तर: जब किसी परावैद्युत माध्यम को बाह्य विद्युत् क्षेत्र में रखा जाता है, तो विद्युत् क्षेत्र के कारण उसके अणुओं के द्विध्रुव आघूर्ण क्षेत्र की दिशा में संरेखित हो जाते हैं (या अणुओं में द्विध्रुव आघूर्ण प्रेरित हो जाते हैं)। इस घटना को परावैद्युत का ध्रुवण कहते हैं।
प्रश्न 2: बाह्य विद्युत् क्षेत्र में परावैद्युत माध्यम रखने पर मूल विद्युत् क्षेत्र की तीव्रता पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर: परावैद्युत माध्यम में प्रेरित आवेश के कारण उत्पन्न विद्युत् क्षेत्र की तीव्रता (Eₚ) मूल विद्युत् क्षेत्र (E₀) की विपरीत दिशा में होती है। अतः परावैद्युत रखने पर प्रभावी विद्युत् क्षेत्र की तीव्रता घट जाती है (E = E₀ – Eₚ)।
प्रश्न 3: ध्रुवित परावैद्युत के मध्य में कुल (नेट) आवेश शून्य क्यों होता है?
उत्तर: ध्रुवण के कारण परावैद्युत के एक फलक पर ऋणावेश और दूसरे फलक पर धनावेश की अधिकता हो जाती है, किन्तु मध्य भाग में प्रत्येक अणु का धनावेश अगले अणु के ऋणावेश के प्रभाव को निरस्त कर देता है, जिससे मध्य में नेट आवेश शून्य रहता है।
प्रश्न 4: सामान्य अवस्था में ध्रुवीय परावैद्युत का परिणामी द्विध्रुव आघूर्ण शून्य क्यों होता है?
उत्तर: बाह्य विद्युत् क्षेत्र की अनुपस्थिति में ध्रुवीय परावैद्युत के अणु तापीय गति के कारण इधर-उधर यादृच्छिक (randomly) बिखरे रहते हैं, जिससे एक अणु का द्विध्रुव आघूर्ण दूसरे के प्रभाव को नष्ट कर देता है और परिणामी द्विध्रुव आघूर्ण शून्य होता है।
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