न्यूटन की गति के नियम (Newton’s Laws of Motion)
न्यूटन के गति का प्रथम नियम या जड़त्व का नियम (Newton’s First Law of Motion or Law of Inertia)
इस नियम के अनुसार, “जो वस्तु स्थिर है वह स्थिर ही रहेगी और जो वस्तु गतिमान है वह उसी वेग से उसी दिशा में तब तक चलती ही रहेगी, जब तक कि उस पर कोई बाह्य बल न लगाया जाये।”
स्पष्ट है कि इस नियम का पहला भाग विराम के जड़त्व को और दूसरा भाग गति के जड़त्व को प्रदर्शित करता है। इस प्रकार गति का प्रथम नियम विराम के जड़त्व और गति के जड़त्व का संयुक्त कथन है। यही कारण है कि न्यूटन के गति के प्रथम नियम को जड़त्व का नियम भी कहते हैं।
न्यूटन के गति के प्रथम नियम से स्पष्ट है कि यदि कोई वस्तु विश्रामवस्था में है तो उसे गत्यावस्था में लाने के लिए उस पर बल लगाना होगा। उसी प्रकार यदि कोई वस्तु नियत वेग से एक सरल रेखा में चल रही है तो उसके वेग में परिवर्तन करने के लिए उस पर बल लगाना होगा। यह भी स्पष्ट है कि वस्तु की गति की दिशा में परिवर्तन करने के लिए भी उस पर बल लगाना पड़ेगा।
यदि कोई वस्तु एकसमान चाल से वृत्तीय गति कर रही है तो उसकी चाल एकसमान होते हुए भी उसकी गति की दिशा सतत् परिवर्तित हो रही है। अतः न्यूटन के गति के प्रथम नियमानुसार उस पर बल लग रहा होता है। यह बल अभिकेंद्र त्वरण की दिशा में अर्थात् केन्द्र की दिशा में कार्य करता है। इस बल को अभिकेंद्र बल (Centripetal force) कहते हैं।
वस्तु विश्रामवस्था में हो अथवा एकसमान वेग से गतिमान हो, दोनों ही स्थितियों में उसका त्वरण शून्य होता है। अतः गति के प्रथम नियम को निम्न प्रकार से भी व्यक्त कर सकते हैं—
यदि किसी वस्तु पर लगने वाला नेट बाह्य बल शून्य है तो उसका त्वरण भी शून्य होगा। वस्तु में त्वरण तभी होगा जबकि उस पर कोई नेट बाह्य बल लगता हो।
स्पष्ट है कि गति का प्रथम नियम बल के बारे में बतलाता है कि बल क्या है? अर्थात् बल की गुणात्मक परिभाषा बतलाता है। बल वह धक्का या खिंचाव है जो किसी वस्तु की विश्रामवस्था या गत्यावस्था में परिवर्तन कर देता है या परिवर्तन करने का प्रयास करता है।
न्यूटन के गति का द्वितीय नियम (Newton’s Second Law of Motion)
यदि कोई वस्तु एकसमान वेग से गतिमान हो तो गति के प्रथम नियम से उस पर नेट बल (Net force) का मान शून्य होगा। अब यदि उस वस्तु पर एक बाह्य बल लगा दिया जाये तो उसका वेग फलस्वरूप उसका संवेग भी परिवर्तित हो जायेगा। न्यूटन के गति का द्वितीय नियम किसी वस्तु पर लगाये गये बल और उसके संवेग में होने वाले परिवर्तन की दर में सम्बन्ध बतलाता है, जो अग्रानुसार है—
“किसी वस्तु के संवेग में परिवर्तन की दर उस पर आरोपित बल के अनुक्रमानुपाती होती है और यह परिवर्तन बल की दिशा में ही होता है।”
मानलो m द्रव्यमान की कोई वस्तु किसी क्षण वेग $$\vec{v}$$ से चल रही है। तब वस्तु का संवेग $$\vec{p} = m\vec{v}$$
मानलो वस्तु पर $$\Delta t$$ समय तक बल $$\vec{F}$$ लगाया जाता है जिससे उसके संवेग में परिवर्तन $$\Delta\vec{p}$$ हो जाता है।
तब, परिवर्तन $$\Delta\vec{p} = \Delta(m\vec{v}) = m\Delta\vec{v}$$
जहाँ $$\Delta\vec{v}$$ वस्तु के वेग में परिवर्तन है।
अतः, संवेग में परिवर्तन की दर = $$\frac{\Delta\vec{p}}{\Delta t} = \frac{m.\Delta\vec{v}}{\Delta t}$$ …(1)
परन्तु $$\frac{\Delta\vec{v}}{\Delta t}$$ = वेग में परिवर्तन की दर = त्वरण $$\vec{a}$$
समी. (1) में मान रखने पर,
संवेग में परिवर्तन की दर $$\frac{\Delta\vec{p}}{\Delta t} = m\vec{a}$$
अब न्यूटन के गति के द्वितीय नियमानुसार,
बल $$\propto$$ संवेग में परिवर्तन की दर
अर्थात् $$\vec{F} \propto \frac{\Delta\vec{p}}{\Delta t}$$ या $$\vec{F} \propto m\vec{a}$$ या $$\vec{F} = k.m\vec{a}$$ …(2)
केवल परिमाण लिखने पर,
$$F = kma$$ …(3)
जहाँ k एक आनुपातिक नियतांक है। इसका मान F, m व a के मात्रकों पर निर्भर करता है।
F, m व a के मात्रक इस प्रकार चुने जाते हैं कि एकांक द्रव्यमान की वस्तु पर एकांक बल लगाने पर उसमें एकांक त्वरण उत्पन्न हो जाता है।
अतः, समी. (3) में F = 1, m = 1 तथा a = 1 रखने पर, k = 1
समी. (2) में k का मान रखने पर,
$$\vec{F} = m\vec{a}$$ …(4)
केवल परिमाण लिखने पर,
F = ma …(5)
शब्दों में, बल = द्रव्यमान $\times$ त्वरण
बल के मात्रक (Units of force)
बल के दो प्रकार के मात्रक होते हैं— 1. निरपेक्ष मात्रक और 2. गुरुत्वीय मात्रक।
1. बल के निरपेक्ष मात्रक (Absolute units of force)—
(i) SI पद्धति में बल का मात्रक न्यूटन (Newton) है जिसे N से प्रदर्शित करते हैं।
समी. (5) में यदि m = 1 किलोग्राम तथा a = 1 मीटर/सेकण्ड2 हो, तो
F = 1 किलोग्राम $$\times 1$$ मीटर/सेकण्ड2 = 1 किलोग्राम-मीटर/सेकण्ड2 = 1 न्यूटन।
अतः, एक न्यूटन का बल वह बल है जो 1 किलोग्राम द्रव्यमान की वस्तु में आरोपित करने पर उसमें 1 मीटर/सेकण्ड2 का त्वरण उत्पन्न कर दे।
(ii) CGS पद्धति में बल का मात्रक डाइन (Dyne) है।
समी. (5) में यदि m = 1 ग्राम तथा a = 1 सेमी/सेकण्ड2 हो, तो
F = 1 ग्राम $$\times 1$$ सेमी/सेकण्ड2 = 1 डाइन
अतः, एक डाइन का बल वह बल है जो 1 ग्राम द्रव्यमान की वस्तु में आरोपित करने पर उसमें 1 सेमी/सेकण्ड2 का त्वरण उत्पन्न कर दे।
न्यूटन और डाइन में सम्बन्ध—
सूत्र— F = ma से,
1 न्यूटन = 1 किलोग्राम $$\times 1$$ मीटर/सेकण्ड2
= $$1000$$ ग्राम $$\times 100$$ सेमी/सेकण्ड2 = $$10^5$$ ग्राम $$\times$$ सेमी/सेकण्ड2
अतः, 1 न्यूटन = $$10^5$$ डाइन।
2. बल के गुरुत्वीय मात्रक (Gravitational units of force)—
(i) MKS पद्धति में बल का गुरुत्वीय मात्रक किलोग्राम भार (kgwt या kgf) होता है।
समी. (5) में यदि m = 1 किग्रा तथा a = 9.8 मीटर/सेकण्ड2 रखें तो
1 किलोग्राम भार = 1 किग्रा $$\times 9.8$$ मीटर/सेकण्ड2 = 9.8 किग्रा-मीटर/सेकण्ड2
∴ 1 किलोग्राम भार = 9.8 न्यूटन।
(ii) CGS पद्धति में बल का गुरुत्वीय मात्रक ग्राम भार (gwt या gf) होता है।
समी. (5) में m = 1 ग्राम तथा a = 981 सेमी/सेकण्ड2 रखने पर,
1 ग्राम भार = 1 ग्राम $$\times 981$$ सेमी/सेकण्ड2 = $$981$$ ग्राम-सेमी/सेकण्ड2
∴ 1 ग्राम भार = 981 डाइन
बल का विमीय सूत्र—
सूत्र— बल = द्रव्यमान $$\times$$ त्वरण
∴ बल का विमीय सूत्र = $$[M] \times [LT^{-2}] = [MLT^{-2}]$$
न्यूटन के गति का तृतीय नियम (Newton’s Third Law of Motion)
इस नियमानुसार “प्रत्येक क्रिया के बराबर और विपरीत प्रतिक्रिया होती है।” अतः इसे क्रिया-प्रतिक्रिया (Action-Reaction) का नियम भी कहते हैं।
यदि एक टेबल के ऊपर एक पुस्तक को रख दें तो पुस्तक अपने भार के कारण टेबल पर नीचे की ओर बल लगाती है। न्यूटन की गति के तृतीयनियममानुसार, टेबल भी पुस्तक पर उतना ही बल ऊपर की ओर लगाती है। पुस्तक द्वारा टेबल पर लगाये गये बल को क्रिया बल (Action) और टेबल द्वारा पुस्तक पर लगाये गये बल को प्रतिक्रिया बल (Reaction) कहते हैं। (चित्र )।
यदि पहली वस्तु द्वारा दूसरी वस्तु पर लगाये गये क्रिया बल को $$\vec{F}_{21}$$ से एवं दूसरी वस्तु द्वारा पहली वस्तु पर लगाये गये प्रतिक्रिया बल को $$\vec{F}_{12}$$ से प्रदर्शित करें तो
$$\vec{F}_{21} = -\vec{F}_{12}$$
ध्यान रहे कि क्रिया बल और प्रतिक्रिया बल दोनों एक ही वस्तु पर कार्य नहीं करते, अपितु भिन्न-भिन्न वस्तुओं पर कार्य करते हैं। अतः ये एक-दूसरे के प्रभाव को नष्ट नहीं कर पाते।
न्यूटन के गति के तृतीय नियम के उदाहरण—
(i) यदि कुएं में से पानी से भरी बाल्टी खींचते समय डोरी टूट जाती है तो खींचने वाला व्यक्ति पीछे की ओर गिर जाता है। व्यक्ति द्वारा डोरी पर लगाया गया बल क्रिया है। इसके विपरीत प्रतिक्रिया बल डोरी के तनाव के माध्यम से बाल्टी पर लगता है। जब डोरी टूट जाती है तो प्रतिक्रिया लुप्त हो जाती है। अतः व्यक्ति क्रिया बल के कारण पीछे की ओर गिर जाता है।
(ii) रायफल से गोली दागते समय रायफल चलाने वाले को पीछे की ओर धक्का लगता है। इसका कारण यह है कि जब रायफल चल जाती है तो बारूद के विस्फोट के कारण गोली तीव्र वेग से आगे की ओर बढ़ती है। गोली जिस बल के कारण आगे बढ़ती है, रायफल पर उतना ही प्रतिक्रिया बल पीछे की ओर लगता है। अतः रायफल चलाने वाले को पीछे की ओर धक्का लगता है।
(iii) जब एक व्यक्ति पृथ्वी पर चलता है तो वह पंजों के द्वारा तिरछा बल F से पृथ्वी को दबाता है। पृथ्वी भी प्रतिक्रिया बल R विपरीत दिशा में लगाती है। प्रतिक्रिया बल R को दो समकोणिक घटकों में वियोजित किया जा सकता है— (i) क्षैतिज घटक H और (ii) ऊर्ध्वाधर घटक V。
ऊर्ध्वाधर घटक V व्यक्ति के भार W को संतुलित करता जबकि क्षैतिज घटक H व्यक्ति को आगे बढ़ने में मदद करता है。
एक व्यक्ति कीचड़ या रेत में चलने में कठिनाई अनुभव करता है, क्योंकि वह इस स्थिति में कीचड़ या रेत पर सही ढंग से क्रिया बल नहीं लगा पाता, फलस्वरूप आगे बढ़ने हेतु उसे पर्याप्त प्रतिक्रिया बल उपलब्ध नहीं हो पाता。
इसी प्रकार बर्फ पर चलते समय पैर और बर्फ की सम्पर्क सतहों के मध्य घर्षण बल नगण्य होने के कारण व्यक्ति को आगे की ओर पर्याप्त प्रतिक्रिया बल प्राप्त नहीं हो पाता। अतः बर्फ पर चलने में कठिनाई होती है।
(iv) जब घोड़ा गाड़ी को खींचता है तो वह अपने खुरों से पृथ्वी को पीछे की ओर दबाता है। घोड़ा और गाड़ी के निकाय (System) पर कार्य करने वाले विभिन्न बलों को प्रदर्शित किया गया है। घोड़े के द्वारा गाड़ी पर आगे की ओर जितना बल (क्रिया बल) $$F_{hc}$$ लगाया जाता है उतना ही प्रतिक्रिया बल $$F_{ch}$$ गाड़ी द्वारा घोड़े पर लगाया जाता है। ये दोनों ही निकाय के अन्दर के क्रिया और प्रतिक्रिया बल होते हैं अतः निकाय को गति देने में असमर्थ होते हैं। गाड़ी का भार $$W_c$$ ऊर्ध्वाधर नीचे की ओर कार्य करता है। अतः पृथ्वी गाड़ी पर प्रतिक्रिया बल $$R_c$$ ऊर्ध्वाधर ऊपर की ओर लगाती है। ये दोनों बल भी निकाय को गति देने में असमर्थ होते हैं। आगे बढ़ते समय घोड़ा अपने खुरों से तिरछे बल F द्वारा पृथ्वी को दबाता है। पृथ्वी भी प्रतिक्रिया बल R विपरीत दिशा में लगाती है। प्रतिक्रिया बल R को दो समकोणिक घटकों में वियोजित किया जा सकता है—
(i) क्षैतिज घटक H और (ii) ऊर्ध्वाधर घटक V。
इनमें से ऊर्ध्वाधर घटक V घोड़े के भार $$W_h$$ को संतुलित करता है। क्षैतिज घटक H गाड़ी को आगे बढ़ाने में मदद करता है。
यदि पृथ्वी और गाड़ी के पहियों के बीच घर्षण बल का मान f हो, तो गाड़ी को आगे बढ़ने के लिए यह आवश्यक है कि $$H > f$$
अतः गाड़ी पर आगे की ओर कार्य करने वाला परिणामी बल $$H – f$$ होगा। यदि गाड़ी में उत्पन्न त्वरण a हो तो गति के दूसरे नियम से,
$$H – f = (m_c + m_h)a$$
या $$a = \frac{H – f}{m_c + m_h}$$
जहाँ $$m_c =$$ गाड़ी का द्रव्यमान तथा $$m_h =$$ घोड़े का द्रव्यमान है।
(v) जब नाव पर सवार व्यक्ति नाव से किनारे पर कूदता है तो वह नाव को अपने पैरों से पीछे की ओर दबाता है। नाव भी विपरीत दिशा में व्यक्ति पर प्रतिक्रिया बल लगाती है जिसके कारण व्यक्ति किनारे की ओर उछलने में समर्थ होता है।
(vi) चित्रों द्वारा क्रिया तथा प्रतिक्रिया बलों का स्पष्टीकरण—
(a) दोनों स्प्रिंग तुला के पाठ समान हैं अंतः क्रिया तथा प्रतिक्रिया बल बराबर होते हैं।
(b) पृथ्वी और चन्द्रमा में कार्यकारी क्रिया-प्रतिक्रिया बल।
इस प्रकार हम कह सकते हैं कि—
(i) क्रिया और प्रतिक्रिया हमेशा एक ही समय पर साथ-साथ आरोपित होते हैं।
(ii) क्रिया और प्रतिक्रिया परिमाण में बराबर परन्तु दिशा में विपरीत होते हैं।
(iii) क्रिया-प्रतिक्रिया बल सदैव जोड़े के रूप में लगते हैं। इनमें से अकेला बल कभी भी आरोपित नहीं हो सकता है।
(iv) क्रिया और प्रतिक्रिया बल सदैव भिन्न-भिन्न वस्तुओं पर कार्य करते हैं। इसी कारण क्रिया और प्रतिक्रिया बल बराबर एवं विपरीत होते हुए भी एक-दूसरे को निरस्त नहीं कर पाते।
न्यूटन की गति के नियम
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न्यूटन की गति के नियम
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