बल-आघूर्ण (Torque)
बल-आघूर्ण (Torque in Physics)- रेखीय गति में हम देख चुके हैं कि यदि हम किसी पिण्ड में रेखीय त्वरण उत्पन्न करना चाहें तो उस पर बल लगाना आवश्यक होता है। इसी तरह घूर्णी गति में किसी पिण्ड में कोणीय त्वरण उत्पन्न करने के लिए उस पर बल-आघूर्ण लगाना पड़ता है।
यदि कोई पिण्ड किसी अक्ष के परितः घूमने में समर्थ हो तो उस पर पर्याप्त बल लगाने से वह पिण्ड घूमने लगता है।
यह देखा गया है कि यदि कोई बल पिण्ड पर अक्ष के पास लगाया जाता है तो उसका प्रभाव कम पड़ता है, किंतु यदि बल अक्ष से अधिक दूरी पर लगाया जाए तो उसका प्रभाव अधिक पड़ता है। उदाहरणार्थ, यदि किवाड़ पर कब्जे के पास बल लगाकर उसे बन्द करें तो अधिक बल लगाना पड़ेगा, किंतु किवाड़ के किनारे पर कम बल लगाकर ही उसे बन्द किया जा सकता है।
किसी बल द्वारा किसी पिण्ड को किसी अक्ष के परितः घुमाने के प्रभाव को उस बल का बल-आघूर्ण कहते हैं।
ऊपर दिये गये उदाहरण से स्पष्ट है कि बल-आघूर्ण का मान निम्न दो बातों पर निर्भर करता है—
(i) बल का परिमाण और (ii) घूर्णन अक्ष से बल की क्रिया रेखा के बीच की लम्बवत् दूरी।
अतः किसी घूर्णन-अक्ष या किसी बिन्दु के परितः बल-आघूर्ण, बल के परिमाण और उस अक्ष या बिन्दु से बल की क्रिया रेखा के बीच की लम्बवत् दूरी के गुणनफल के बराबर होता है।
सूत्र के रूप में, बल-आघूर्ण = बल × बल की क्रिया रेखा की अक्ष से लम्बवत दूरी
बल की क्रिया रेखा की अक्ष से लम्बवत दूरी को आघूर्ण भुजा (Moment arm) या उत्सोलक भुजा (Lever arm) भी कहते हैं।
$$\tau = F \times d \quad \dots(1)$$
बल-आघूर्ण एक सदिश राशि है।
मात्रक— $$\tau = F \times d$$ से, τ का मात्रक = F का मात्रक × d का मात्रक। इस प्रकार SI पद्धति में बल-आघूर्ण का मात्रक न्यूटन-मीटर है।
ध्यान रहे: कार्य के मात्रक न्यूटन-मीटर को जूल लिखते हैं। लेकिन बल-आघूर्ण के मात्रक न्यूटन-मीटर को जूल नहीं लिख सकते क्योंकि कार्य अदिश राशि है जबकि बल-आघूर्ण सदिश राशि है।
विमीय सूत्र— बल-आघूर्ण का विमीय सूत्र $$[ML^2T^{-2}]$$ है।
कार्य और बल-आघूर्ण में अन्तर
| कार्य (Work) | बल-आघूर्ण (Torque) |
|---|---|
| 1. यह एक अदिश राशि है। | 1. यह एक सदिश राशि है। |
| 2. कार्य, बल और बल की दिशा में विस्थापन के गुणनफल के बराबर होता है। | 2. बल-आघूर्ण, बल और बल की क्रिया रेखा की घूर्णन-अक्ष से लम्बवत् दूरी के गुणनफल के बराबर होता है। |
बल-आघूर्ण का सदिश रूप (Vector Form of Torque)
चित्र के अनुसार माना कि कोई पिण्ड घूर्णन-अक्ष YY’ के सापेक्ष घूर्णी गति कर रहा है। उसकी घूर्णन-अक्ष पिण्ड के बिन्दु O से गुजरती है। बिन्दु A पर एक बल $$\vec{F}$$ लगाया गया है। मानलो बिन्दु O और A कागज के तल में तथा घूर्णन-अक्ष कागज के तल के लम्बवत् है। मानलो O के सापेक्ष बिन्दु A का स्थिति सदिश $$\vec{r} = \vec{OA}$$ है।

बिन्दु O से बल $$\vec{F}$$ की क्रिया रेखा पर OB लम्ब डालो। तब अक्ष से बल $$\vec{F}$$ की क्रिया रेखा के बीच की लम्बवत् दूरी OB होगी।
अतः बल-आघूर्ण का परिमाण— $$\tau = F \times OB \quad \dots(1)$$
यदि $$\vec{r}$$ और $$\vec{F}$$ के मध्य कोण θ हो, तो $$\angle OAB = \theta$$
अब समकोण $$\Delta OBA$$ में, $$\sin\theta = \frac{OB}{OA} \implies OB = OA\sin\theta = r\sin\theta$$
समी. (1) में मान रखने पर,
$$\tau = r \times F\sin\theta$$
समी. (3) को सदिश रूप में निम्न प्रकार से लिख सकते हैं —
यही सदिश रूप में बल-आघूर्ण का व्यंजक है। अतः बल-आघूर्ण $$\vec{\tau}$$, $$\vec{r}$$ और $$\vec{F}$$ के सदिश गुणनफल के बराबर होता है।
समी. (3) $$\tau = Fr\sin\theta$$ से स्पष्ट है कि—
(i) यदि r = 0 तो τ= 0। अतः यदि बल को घूर्णन-अक्ष के ही किसी बिन्दु पर लगाया जाये तो बल-आघूर्ण शून्य होगा। यही कारण है कि किवाड़ को उसके कब्जे पर (अक्ष पर) बल लगाकर न तो बन्द किया जा सकता है और न ही खोला जा सकता है।
(ii) यदि $$\sin\theta = 0$$ अर्थात् $$\theta = 0^\circ$$ या $$180^\circ$$ हो, तो $$\tau = 0$$। अतः यदि बल की क्रिया रेखा उस बिन्दु से होकर जाती है जिसके परितः पिण्ड घूमता है, तो बल आघूर्ण का मान शून्य होता है।
(iii) यदि $$\sin\theta = 1$$ अर्थात् $$\theta = 90^\circ$$ हो, तो $$\tau = F \cdot r$$ (अधिकतम)। अतः यदि बल अपनी क्रिया रेखा के स्थिति सदिश के लम्बवत् लगाया जाता है तो बल आघूर्ण का मान अधिकतम होता है।
(iv) यदि F = 0 तो τ = 0। अतः यदि बल का मान शून्य है तो बल-आघूर्ण भी शून्य होगा। फलस्वरूप पिण्ड घूमेगा नहीं।
(v) यदि r का मान अधिक है तो τ का मान भी अधिक होगा। अतः यदि बल की क्रिया रेखा घूर्णन-अक्ष से अधिक दूरी पर है तो बल-आघूर्ण का मान अधिक होगा। ऐसी स्थिति में कम बल लगाकर भी पिण्ड को आसानी से घुमाया जा सकता है।
बल-आघूर्ण की दिशा— बल-आघूर्ण $$\vec{\tau}$$ की दिशा $$\vec{r}$$ और $$\vec{F}$$ के सम्मिलित तल के लम्बवत् घूर्णन-अक्ष के अनुदिश होती है। यदि पिण्ड वामावर्त्त दिशा में घूमने का प्रयास करे तो कागज के तल के लम्बवत् ऊपर की ओर और यदि दक्षिणावर्त्त दिशा में घूमने का प्रयास करे तो कागज के तल के लम्बवत् नीचे की ओर होती है।
दैनिक जीवन में बल-आघूर्ण के कुछ उदाहरण—
(i) पेंचकस का हत्था चौड़ा बनाया जाता है। ऐसा करने से आरोपित बल की क्रिया रेखा से अक्ष की लम्बवत् दूरी बढ़ जाती है। फलस्वरूप बल आघूर्ण का मान बढ़ जाता है। अतः पेंच आसानी से घूमने लगता है।
(ii) आटा पीसने की चक्की में हत्था परिधि के पास लगाया जाता है। चक्की को हत्थे से पकड़कर घुमाया जाता है। हत्था परिधि के पास लगा होता है। अतः बल की क्रिया रेखा की अक्ष (चक्की की कीली) से लम्बवत् दूरी बढ़ जाती है। फलस्वरूप बल-आघूर्ण का मान भी बढ़ जाता है, जिससे चक्की को घुमाना आसान हो जाता है।
(iii) जल पम्प का हत्था लम्बा होता है। हत्था के लम्बा होने से हत्थे की पिस्टन से लम्बवत् दूरी अधिक हो जाती है। इस प्रकार बल की क्रिया रेखा की अक्ष से लम्बवत् दूरी अधिक होने के कारण बल-आघूर्ण का मान बढ़ जाता है।
(iv) पाने (Wrench) की सहायता से नट को खोलना आसान होता है। इस स्थिति में बल की क्रिया रेखा की अक्ष से लम्बवत् दूरी बढ़ जाती है जिससे बल-आघूर्ण का मान भी बढ़ जाता है। अतः नट आसानी से घूम जाता है।
उदाहरण (Numerical Example):
एक कण पर जिसका स्थिति सदिश $$\vec{r} = \hat{i} – \hat{j} + \hat{k}$$ मीटर है पर बल $$\vec{F} = 5\hat{i} + 3\hat{j} – 5\hat{k}$$ न्यूटन लगाया जाता है। मूलबिन्दु के परितः बल आघूर्ण की गणना कीजिए।
हल—
दिया है, $$\vec{r} = \hat{i} – \hat{j} + \hat{k}$$ तथा $$\vec{F} = 5\hat{i} + 3\hat{j} – 5\hat{k}$$
$$= 3\hat{k} + 5\hat{j} + 5\hat{k} + 5\hat{i} + 5\hat{j} – 3\hat{i}$$
$$= 2\hat{i} + 10\hat{j} + 8\hat{k} \text{}$$ न्यूटन-मीटर। उत्तर
बल-आघूर्ण (Torque in Physics)
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