हाइगन का द्वितीयक तरंगिकाओं का सिद्धांत (Huygen’s Theory of Secondary Wavelets)
माध्यम में तरंग संचरण तथा तरंग का आगे बढ़ना समझाने के लिए हाइगन ने द्वितीयक तरंगिकाओं का सिद्धांत प्रतिपादित किया. इसके द्वारा हम ज्यामितीय विधि से यह ज्ञात कर सकते हैं कि किसी क्षण विशेष पर तरंगाग्र की स्थिति कहाँ पर होगी.
सिद्धांत के मुख्य बिंदु
- तरंगाग्र का प्रत्येक बिंदु तरंग-स्रोत का कार्य करता है जिससे नई तरंगें उत्पन्न होती हैं, इन्हें द्वितीयक तरंगिकाएँ कहते हैं.
- द्वितीयक तरंगिकाएँ मूल तरंग के वेग से ही आगे बढ़ती हैं.
- किसी भी क्षण इन द्वितीयक तरंगिकाओं पर बाहर की ओर खींचा गया ‘अन्वालोप’ (Envelop) उस क्षण पर नए तरंगाग्र की स्थिति को दर्शाता है.
नवीन तरंगाग्र का निर्माण
यदि S एक बिंदु प्रकाश-स्रोत है और AB एक गोलाकार तरंगाग्र का भाग है, तो t समय पश्चात तरंगाग्र की स्थिति ज्ञात करने के लिए AB पर बिंदु P1, P2, P3, … लिए जाते हैं. इन बिंदुओं से vt दूरी (जहाँ v तरंग का वेग है) के गोले खींचने पर बाहर की ओर खींचा गया अन्वालोप A1B1 नवीन तरंगाग्र को प्रदर्शित करता है.
ध्यान दें:
तरंगों के आगे बढ़ने की दिशा में ही मुख्य अन्वालोप (A1B1) लिया जाता है। पीछे की ओर बना अन्वालोप (CD) किरणों के विपरीत दिशा में होता है, इसलिए इसे तरंगाग्र नहीं कहा जाता है.
विस्तृत नोट्स के लिए Educationallof.com पर विजिट करें।
हाइगन का द्वितीयक तरंगिकाओं का सिद्धांत: अभ्यास प्रश्न
प्रश्न 1: हाइगन ने द्वितीयक तरंगिकाओं का सिद्धांत क्यों प्रतिपादित किया?
उत्तर: हाइगन ने यह सिद्धांत माध्यम में तरंग संचरण तथा तरंग के आगे बढ़ने की प्रक्रिया को विस्तार से समझाने के लिए प्रतिपादित किया, जिससे ज्यामितीय विधि द्वारा किसी भी क्षण तरंगाग्र की स्थिति का निर्धारण किया जा सके.
प्रश्न 2: द्वितीयक तरंगिकाएँ (Secondary Wavelets) क्या होती हैं?
उत्तर: तरंगाग्र का प्रत्येक बिंदु एक नए तरंग-स्रोत की भाँति व्यवहार करता है, जिससे नई तरंगें उत्पन्न होती हैं। इन्हीं तरंगों को द्वितीयक तरंगिकाएँ कहा जाता है.
प्रश्न 3: नवीन तरंगाग्र का निर्माण कैसे होता है?
उत्तर: किसी भी क्षण द्वितीयक तरंगिकाओं पर बाहर की ओर खींचा गया ‘अन्वालोप’ (Envelop) या स्पर्श रेखा उस क्षण नए तरंगाग्र की स्थिति को प्रदर्शित करता है.
प्रश्न 4: t समय पश्चात तरंगाग्र की स्थिति ज्ञात करने के लिए क्या विधि अपनाई जाती है?
उत्तर: इसके लिए तरंगाग्र के विभिन्न बिंदुओं को केंद्र मानकर ‘vt’ त्रिज्या (जहाँ v तरंग का वेग है) के गोले खींचे जाते हैं। इन गोलों के बाहर खींचा गया अन्वालोप ही नवीन तरंगाग्र होता है.
प्रश्न 5: तरंगाग्र के निर्माण में पीछे की ओर बने अन्वालोप (CD) को क्यों नहीं लिया जाता?
उत्तर: चूँकि पीछे की ओर बना अन्वालोप CD प्रकाश-किरणों के बढ़ने की दिशा के विपरीत होता है, इसलिए भौतिक रूप से इसे तरंगाग्र की संज्ञा नहीं दी जाती है.
हाइगन का द्वितीयक तरंगिकाओं का सिद्धांत (Huygen’s Theory of Secondary Wavelets)
और भी पढ़ें –
न्यूटन के कणिका-सिद्धान्त से प्रकाश का परावर्तन (Reflection of Light) – विस्तृत व्याख्या
न्यूटन के कणिका-सिद्धान्त से प्रकाश का अपवर्तन (Refraction) – विस्तृत व्याख्या
हाइगन का तरंग-सिद्धांत (Huygens’ Wave Theory), परिकल्पनाएं , निष्कर्ष- पूरी जानकारी
न्यूटन का कणिका-सिद्धान्त (Newton’s Corpuscular Theory): क्या था? क्यों असफल हुआ?
प्रकाश की प्रकृति (Nature of Light) और प्रकाशिकी: महत्वपूर्ण सिद्धांत
Play quiz here 👇👇👇
Join Our Physics Community!
Latest Physics Notes, PGT/NET Prep & Daily MCQs directly on your WhatsApp.
100% Private & Secure | No Phone Number Required