
भू अधिग्रहण अधिनियम 2013
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भू अधिग्रहण अधिनियम 2013
सरकार द्वारा भूमि अधिग्रहण –
सरकार का यह अधिकार है कि सार्वजनिक उपयोग के लिए अगर किसी निजी व्यक्ति या गाँव की जमीन की आवश्यकता है तो सरकार उन्हें उचित मुआवज़ा देकर अधिग्रहित कर सकती है।
इस कानून की मदद से सरकार विभिन्न उपयोगों जैसे सड़क, रेलमार्ग, हवाई अड्डे, खदान, औद्योगिक क्षेत्र, अस्पताल, दफ्तर, बाँध आदि के लिए जमीन की व्यवस्था करती है।
अक्सर इस काम के लिए बहुत बड़ी मात्रा में ज़मीन की ज़रूरत होती है, यहाँ तक कि कई गाँव के लोग इससे विस्थापित हो सकते हैं।
जैसे हमने ऊपर पढ़ा था कि ऐसे में उचित मुआवजा कैसे तय किया जाये इसको लेकर विवाद रहा है।
2013 में इस संबंध में एक महत्वपूर्ण कानून बना जिसका नाम है ‘भूमि अधिग्रहण अधिनियम 2013’।
भू अधिग्रहण अधिनियम 2013
- इस अधिनियम में भूमि अधिग्रहण के साथ-साथ पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन का भी प्रावधान है।
- निजी कंपनियों अथवा सार्वजनिक-निजी भागीदारियों के इस्तेमाल हेतु भूमि के अधिग्रहण के मामले में 80 प्रतिशत विस्थापित व्यक्तियों की सहमति अपेक्षित है।
- विस्थापित या अधिग्रहण द्वारा प्रभावित परिवारों में संबंधित भूस्वामियों के साथ साथ वे सभी लोग भी सम्मिलित होंगे जो उस ज़मीन से अपनी आजीविका पाते थे जैसे मज़दूर, बटाईदार, चरवाहे, आदिवासी आदि
- केवल अतिविशेष परिस्थितियों में ही बहुफसलीय व सिंचित कृषिभूमि का गैर कृषि उपयोग के लिए अधिग्रहित किया जा सकेगा।
- अधिग्रहण से पूर्व उस ज़मीन के उपयोग के परिवर्तन का सामाजिक व पर्यावरणीय प्रभाव का अध्ययन किया जायेगा।
- भूस्वमियों व अन्य को उचित मात्रा में मुआवज़ा दिया जायेगा।
- जिस काम के लिए भूमि का अधिग्रहण किया गया है उससे अलग काम भूमि पर नहीं किया जा सकता है और पाँच वर्ष से अधिक समय में उस भूमि का उपयोग नहीं होता तो उसे पुराने भूस्वामियों को लौटा दिया जाएगा।
- सरकार की पूर्व-अनुमति के बिना अधिग्रहित भूमि के स्वामित्व में कोई परिवर्तन नहीं होना है।
कई उद्योगपति व सरकारी अफसर जो नए उद्योग लगाने के लिए ज़मीन चाहते हैं यह शिकायत कर रहे हैं कि इस कानून के कारण उन्हें ज़मीन मिलना बहुत कठिन और महँगा हो गया है।