सतत एवं समग्र मूल्यांकन (Continuous and Comprehensive Evaluation – CCE)
राष्ट्रीय शिक्षा नीति और बाल केंद्रित शिक्षा प्रणाली में मूल्यांकन को केवल परीक्षा तक सीमित न रखकर इसे शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया का एक अभिन्न अंग बनाया गया है। सतत एवं समग्र मूल्यांकन (CCE) एक ऐसी प्रक्रिया है जो बालक के विकास के सभी पहलुओं का निरंतर और व्यापक रूप से आकलन करती है। इसका मुख्य उद्देश्य परीक्षा के भय को दूर करना और छात्र के सर्वांगीण विकास को बढ़ावा देना है।
1. CCE का अर्थ एवं अवधारणा (Meaning of CCE)
CCE को दो मुख्य भागों में समझ सकते हैं:
(A) सतत (Continuous):
- अर्थ: यह मूल्यांकन शिक्षण प्रक्रिया के साथ-साथ निरंतर (Continuous) चलता रहता है।
- उद्देश्य: शिक्षण के दौरान ही छात्रों की अधिगम संबंधी कमियों का पता लगाकर (निदान) समय पर सुधारात्मक शिक्षण (उपचार) प्रदान करना।
(B) समग्र / व्यापक (Comprehensive):
- अर्थ: इसमें बालक के सर्वांगीण विकास (All-round Development) के दो प्रमुख क्षेत्रों का आकलन शामिल होता है:
- 1. शैक्षणिक क्षेत्र (Scholastic Area): विषय-वस्तु जैसे विज्ञान, गणित, भाषा, सामाजिक विज्ञान आदि से संबंधित ज्ञान।
- 2. सह-शैक्षणिक क्षेत्र (Co-Scholastic Area): जीवन कौशल (Life Skills), अभिवृत्ति, मूल्य, खेलकूद, कला, संगीत तथा नैतिक व्यवहार।
2. निर्माणात्मक एवं योगात्मक मूल्यांकन (Formative & Summative Evaluation)
(1) निर्माणात्मक / रचनात्मक मूल्यांकन (Formative Assessment – FA):
- यह शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया के दौरान (During Instruction) किया जाता है।
- इसका उद्देश्य फीडबैक देना, कमियों की पहचान करना और सुधार लाना है।
- उदाहरण: कक्षा में प्रश्नोत्तर, यूनिट टेस्ट, क्विज़, असाइनमेंट, प्रोजेक्ट आदि।
(2) योगात्मक / संकल्पनात्मक मूल्यांकन (Summative Assessment – SA):
- यह शिक्षण अवधि या सत्र के अंत में (At the End of Term) किया जाता है।
- इसका उद्देश्य ग्रेड, अंक देना, पास/फेल तय करना या अगली कक्षा में प्रोन्नत करना है।
- उदाहरण: वार्षिक परीक्षा, बोर्ड परीक्षा, सेमेस्टर अंत परीक्षा।
3. CCE के प्रमुख उद्देश्य एवं विशेषताएं (Objectives & Features)
- परीक्षा के भय को दूर करना: केवल अंत में एक बार परीक्षा लेने के बजाय निरंतर आकलन से बच्चों का मानसिक तनाव दूर होता है।
- रटने की आदत को हतोत्साहित करना: यह समझ और कौशलों के विकास पर जोर देता है, न कि रटकर उत्तर देने पर।
- सर्वांगीण विकास: संज्ञानात्मक (Cognitive), भावात्मक (Affective) तथा मनोक्रियात्मक (Psychomotor) तीनों पक्षों का विकास।
- निदानात्मक एवं उपचारात्मक: अधिगम कठिनाइयों की पहचान करके तुरंत उपचारात्मक शिक्षण देना।
- स्व-मूल्यांकन (Self-Assessment): विद्यार्थियों में स्वयं सीखने की क्षमता और आत्म-निरीक्षण का विकास करना।
4. महत्वपूर्ण अभ्यास प्रश्न (Practice MCQs)
Q1. CCE में ‘व्यापक’ (Comprehensive) शब्द का क्या अर्थ है?
उत्तर: शैक्षणिक और सह-शैक्षणिक दोनों क्षेत्रों का मूल्यांकन करना (सर्वांगीण विकास)।
Q2. शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया के दौरान बच्चों को तुरंत प्रतिपुष्टि (Feedback) देने के लिए कौन-सा मूल्यांकन उपयोगी है?
उत्तर: निर्माणात्मक/रचनात्मक मूल्यांकन (Formative Assessment)
Q3. सत्र के अंत में बालक के उपलब्धि स्तर को आंकने के लिए किया जाने वाला मूल्यांकन क्या कहलाता है?
उत्तर: योगात्मक/संकल्पनात्मक मूल्यांकन (Summative Assessment)
Q4. सतत एवं समग्र मूल्यांकन (CCE) का सबसे मुख्य उद्देश्य क्या है?
उत्तर: बालकों में रटने की प्रवृत्ति को कम करना और अधिगम की प्रक्रिया को निरंतर व तनावमुक्त बनाना।
Q5. जीवन कौशल, अभिवृत्ति तथा सह-पाठ्यचर्या गतिविधियां CCE के किस क्षेत्र के अंतर्गत आती हैं?
उत्तर: सह-शैक्षणिक क्षेत्र (Co-Scholastic Area)
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