
विद्युत् वाहक बल और विभवान्तर में अन्तर
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विद्युत् वाहक बल और विभवान्तर में अन्तर
वि. वा. बल और विभवान्तर दोनों का अर्थ एक ही नहीं है , क्योंकि यदि किसी विद्युत् परिपथ में एक सेल के विपरीत अधिक विद्युत् वाहक बल वाला दूसरा सेल जोड़ दिया जाये , तो विभवान्तर की दिशा के साथ ही विद्युत् धारा की दिशा भी बदल जाती है , जबकि वि. वा. बल की दिशा वही रहती है।
विद्युत् वाहक बल :-
1. यह सेल के दोनों ध्रुवों के बीच का अधिकतम विभवान्तर होता है , जबकि सेल खुले परिपथ में हो।
2. इस शब्द का उपयोग विद्युत् स्त्रोतों , जैसे – जनरेटर , सेल , बैटरी , डायनेमो इत्यादि के लिए किया जाता है।
3. विद्युत् परिपथ भंग होने पर भी इसका अस्तित्व रहता है।
4. किसी सेल का वि. वा. बल परिपथ के प्रतिरोध पर निर्भर नहीं करता।
5. इसके कारण किसी विद्युत् परिपथ में धारा प्रवाहित होती है।
विभवान्तर :-
1. यह किसी विद्युत् परिपथ के किन्हीं बिन्दुओं के विभवों का अन्तर का अन्तर होता है।
2. इस शब्द का उपयोग परिपथ के किन्हीं दो बिन्दुओं के लिए किया जाता है।
3. विद्युत् परिपथ भंग होने पर इसका अस्तित्व समाप्त हो जाता है।
4. परिपथ के किन्हीं दो बिन्दुओं के बीच का विभवान्तर उन दोनों बिन्दुओं के बीच लगे प्रतिरोध के मान पर निर्भर करता है।
5. किसी परिपथ में धारा प्रवाहित होने के फलस्वरूपवि भवान्तर उत्पन्न होता है।
नर्म लोहा और फौलाद के चुम्बकीय गुणों की तुलना :-
नर्म लोहा :-
1. नर्म लोहा में फौलाद की तुलना में अधिक चुम्बकीय उत्पन्न किया जा सकता है क्योंकि इसकी चुम्बकीय प्रवृत्ति अधिक होती है।
2. नर्म लोहा अपने चुम्बकत्व को अधिक देर तक बनाये नहीं रख पाता अर्थात् नर्म लोहे की धारणशीलता कम होती है।
3. नर्म लोहे का चुम्बकन और विचुम्बकन दोनों सरल हैं।
4. इसे चुम्बकित करके विचुम्बकित करने में कम ऊर्जा क्षय होती है अर्थात् शैथिल्य हानि कम होती है।
5. अस्थायी चुम्बक नर्म लोहे के बनाये जाते हैं।
फौलाद (इस्पात) :-
1. फौलाद में नर्म लोहे की तुलना में कम चुम्बकत्व उत्पन्न होता है क्योंकि इसकी चुम्बकीय प्रवृत्ति कम होती है।
2. फौलाद अपने चुम्बकत्व को अधिक देर तक बनाये रख सकता है अर्थात् उसकी धारणशीलता अधिक होती है।
3. फौलाद का चुम्बकन और विचुम्बकन दोनों कठिन है।
4. इसे चुम्बकित करके विचुम्बकित करने में अधिक ऊर्जा क्षय होती है अर्थात् शैथिल्य हानि अधिक होती है।
5. स्थायी चुम्बक फौलाद के बनाये जाते हैं।
चल कुण्डली धारामापी और स्पर्शज्या धारामापी में तुलना :-
चल कुण्डली धारामापी :-
1. इसमें विद्युत् धारा का मान विक्षेप के अनुक्रमानुपाती होती है।
2. इस धारामापी को किसी भी दिशा में रखकर प्रयोग किया जा सकता है।
3. बाह्य चुम्बकीय क्षेत्र का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।
4. इसमें स्थायी पैमाना लगाया जा सकता है , क्योंकि धारामापी नियतांक का मान सभी स्थानों पर एकसमान रहता है।
5. इससे अत्यंत निर्बल धारा मापी जा सकता है। (10⁻⁹ ऐम्पियर तक )
6. इसमें एक दाब कुंजी का प्रयोग कर कुण्डली को लघु परिपथ करके उसका हिलना जल्दी रोका जा सकता है।
स्पर्शज्या – धारामापी :-
1. इसमें धारा का मान विक्षेप के कोण की स्पर्शज्या के अनुत्क्रमानुपाती होता है।
2. इसमें प्रयोग करते समय इसकी कुण्डली को चुम्बकीय याम्योत्तर में समायोजित करना पड़ता है।
3. इसमें बाह्य चुम्बकीय क्षेत्र का बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है।
4. इसमें स्थायी पैमाना नहीं लगाया जा सकता , क्योंकि परिवर्तन गुणांक का मान भिन्न भिन्न स्थानों पर भिन्न भिन्न होता है।
5. इससे अत्यंत निर्बल धारा नहीं मापी जा सकती है।
6. इसमें सुई एक बार विक्षेपित होने के बाद देर तक हिलती रहती है उसको जल्दी रोकने का कोई प्रबंध नहीं है।