
भूमि निम्नीकरण और संरक्षण उपाय
भूमि निम्नीकरण और संरक्षण उपाय
हमें भूमि अपने पूर्वजों से विरासत में मिली है और इसे हमें सही हालत में आने वाली पीढ़ी को सौंपना है।
मानव अपने क्रियाकलापों के माध्यम से भूमि को सवर्धित कर सकता है या फिर उसे क्षति पहुँचा सकता है।
किसी भूमि की गुणवत्ता को हम किस तरह से आँक सकते हैं?
भूमि किस हद तक जीव जन्तुओं को पनपने में मदद करती है और कितने टिकाऊपन के साथ मदद कर सकती है, उससे उसकी गुणवत्ता का आकलन कर सकते हैं।
यह क्षमता धरती के अलग-अलग जगहों पर अलग अलग होगी।
मरूस्थल और सदाबहार वन के क्षेत्र में भूमि की यह क्षमता एक जैसी तो नहीं होगी लेकिन जब किसी क्षेत्र की भूमि की क्षमता पहले से कम होने लगती है तो हम उसे भूमि का निम्नीकरण कहते हैं।
उदाहरण के लिए अगर बाढ़ के कारण किसी खेत पर रेत बिछ जाए और वह कृषि या चराई योग्य नहीं रहे तो हम उसे निम्नीकृत ज़मीन कहेंगे।
उस ज़मीन पर पौधे व अन्य जीव जन्तु व मनुष्य को पोषण अब पहले जैसे नहीं मिल पाएगा।
मानव कार्यकलापों के कारण भी भूमि का निम्नीकरण हो रहा है। मानव विभिन्न प्रकार से भूमि के निम्नीकरण का कारण बनता है।
अक्सर सूखे या ढलुआ प्रदेश की भूमि पर जब हल चलाकर खेती की जाती है तो वहाँ की महीन मिट्टी हवा के साथ उड़ जाती है या पानी के साथ बह जाती है और केवल मोटे कण और कंकड़ रह जाते हैं।
ऐसी भूमि में कोई घास या फसल नहीं हो सकती है।
रेगिस्तानी प्रदेश में नहर से सिंचाई करने से नीचे के लवण पदार्थ पानी के साथ ऊपर उठकर मिट्टी की सतह पर जम जाते हैं, जिससे उस मिट्टी पर पौधे नहीं उग पाते हैं।
यह भी भूमि निम्नीकरण का उदाहरण है।
पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में अधिक सिंचाई भूमि के कारण भूमि दलदल बन रहा है और मिट्टी का लवणीकरण हो रहा है।
गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के सूखे इलाकों में अत्यधिक चराई, भूमि निम्नीकरण का मुख्य कारण है।
भूमि की क्षमता से अधिक पशुओं की चराई से न केवल घास का आवरण और पौधे नष्ट हो जाते हैं, बल्कि ऊपरी परत की मिट्टी भी हवा के साथ उड़ जाती है।
ओपन कास्ट उत्खनन से भूमि की ऊपरी परत को हटाकर नीचे बडे गड्ढे खोदकर खनिज निकाला जाता है।
उसके बाद वहाँ की जमीन किसी उपयोग लायक नहीं रह जाती है। यह भी भूमि निम्नीकरण का उदाहरण है।
खनन के बाद खदानों वाले स्थानों को गहरी खाइयों और मलबे के साथ खुला छोड़ दिया जाता है।
झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और ओडीशा जैसे राज्यों में खनन वन भूमि निम्नीकरण का कारण बना हुआ है।
सीमेंट उद्योग में चूना पत्थर को पीसना और मृदा बर्तन उद्योग में खड़िया मिट्टी और सेलखड़ी के प्रयोग से बहुत अधिक मात्रा में वायुमंडल में धूल घुल जाती है।
जब इसकी परत भूमि पर जम जाती है तो मृदा की जल सोखने की प्रक्रिया रूक जाती है।
पिछले कुछ वर्षों से देश के विभिन्न भागों में औद्योगिक जल निकास से बाहर आने वाला अपशिष्ट पदार्थ भूमि और जल प्रदूषण का मुख्य स्रोत है।
विभिन्न गणनाओं के अनुसार इस समय भारत में लगभग 13 से 19 करोड़ हेक्टेयर भूमि निम्नीकृत है।
इसमें से लगभग 28 प्रतिशत भूमि निम्नीकृत वनों के अंतर्गत है 56 प्रतिशत क्षेत्र जल अपरदित है और शेष क्षेत्र लवणीय और क्षारीय है।
छत्तीसगढ़ में लगभग 47,84,000 हेक्टेयर भूमि, राज्य की कुल भूमि का 35 प्रतिशत निम्नीकरण से प्रभावित है। यह मुख्य रूप से पानी द्वारा क्षरण और भूमि की अम्लीयता के कारण है।
अम्लीयता भूमि क्षरण के कारण होता है और यह फसलों को प्रभावित करता है। अम्लीयता को नियंत्रित करने के लिए मिट्टी में चूना मिलाया जा सकता है।
दुर्ग, जांजगीर, कोरबा और रायपुर जिलों में उत्खनन के कारण भूमि का निम्नीकरण हुआ है।
भूमि निम्नीकरण की समस्याओं को सुलझाने के कई तरीके हैं।
वनारोपण और चरागाहों का उचित प्रबंधन इसमें कुछ हद तक मदद कर सकते हैं।
जो भूमि कृषि योग्य नहीं है, वहाँ जंगल लगाना या चरागाह विकसित करना उचित होगा।
इसी तरह सिंचाई को भूमि की क्षमता के अनुरूप रखकर दलदलीकरण और लवणीकरण जैसी समस्याओं से बचा सकता है।
भूमि निम्नीकरण और गरीबी
देश के सबसे गरीब समुदाय निम्नीकृत भूमि पर आश्रित हैं।
वे या तो गरीब पशुपालक हैं या फिर निम्न गुणवत्ता वाली भूमि पर खेती करने वाले गरीब व सीमान्त किसान व आदिवासी हैं।
अन्य किसी आजीविका के संसाधन के अभाव में वे इस निम्न भूमि का और दोहन करने पर मजबूर हो जाते हैं जिसके कारण निम्नीकरण और तेज़ हो जाता है।
अक्सर गरीबी के कारण ये समुदाय ज़मीन के संवर्धन के लिए उचित – उपाय भी नहीं कर पाते हैं।
इस तरह गरीबी और भूमि निम्नीकरण एक दूसरे के कारण बनकर एक कुचक्र स्थापित करते हैं।
इसलिए यह आवश्यक है कि इन प्रदेशों में भूमि संवर्धन का जिम्मा सरकार उठाए और गरीबों की आजीविका और भूमि की गुणवत्ता की रक्षा करे।